सुनील माहेश्वरी, की जन्मभूमि कासगंज (उत्तर प्रदेश) और कर्मभूमि दिल्ली है, और प्रख्यात फार्मा कंपनी अल्कैम लैबोरेटरी, दिल्ली में वरिष्ठ क्षेत्रीय प्रबंधक के साथ-साथ बहुमुखी प्रतिभा के धनी सुनील माहेश्वरी एक मोटीवेशनल लेखक, विचारक, कवि, प्रेरकवक्ता ,ब्लॉगर, शायर और आर्टिस्ट हैं, उच्च शिक्षा गाजियाबाद शहर के प्रख्यात व्यवसाय प्रबंधन संस्थान इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोडक्टीवटी ऐंड मैनेजमेंट (IPM) से मास्टर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन की डिग्री प्राप्त की। और देश की कई प्रख्यात फार्मास्युटिकल संस्थाओं में प्रबंधक रहे हैं। आपकी रुचियों में लेखन, सामान्य ज्ञान, लाईफ कोचिंग, संगीत, गज़ल सुनना, लेखन प्रतियोगिता में हिस्सा व चित्रकारी आदि हैं। आपकी बहुत सारी कविताएं, लेख, आलेख, राष्ट्रीय समाचार पत्रिकाओं, सोशल मीडिया एप, मैगजीन, और ई पत्रिका में प्रकाशित हो चुके हैं, और पंच प्रवाह, आशायें, इनफाइनाईट लव, शब्दांचल, वांडरलस्ट, आफ्टरलाईफ, इनफाइनाईट लव, वैल रिटन, ज्यूकबाॅक्स औफ मैमोरी, यस्टर्डे, देजा वू, ए लिटिल बुक आंफ राइटर्स, लव औफ लाईफ, द मैजिक टी, द वर्निग डिजायर, मोटीवेशन एंड यू पुस्तक के सह-लेखक भी हैं। और अभी 10 पुस्तकों में सहलेखक की भूमिका निभा रहे हैं, अपने ऊर्जावान और प्रेरणा से ओतप्रोत कविताओं, कोट्स, लेख, आलेख से लोगों को प्रभावित किया है। पुरस्कारों में इन्हें साहित्यिक कर्नल की उपाधि से सम्मानित किया गया है। ऑथर ऑफ द ईयर, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट,(IIM), रांची द्वारा कविता लेखन में सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार, आई. सी. आई. सी. आई बैंक द्वारा प्रायोजित कविता लेखन प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इन्हें साहित्य रचना द्वारा साहित्य रचना सम्मान पत्र से सम्मानित किया गया है। इन्हें साहित्य के अमूल्य योगदान के लिए इंकजाॅयड फाउन्डेशन द्वारा आइकोनिक पर्सनेलिटी ऑफ द ईयर और इंटरनेशनल टेलेंट के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है।

“यारो कोशिशें भी कमाल करती है।”

यूं ही नहीं मिल जाती मंजिंल,

सिर्फ एक पल भर सोचने से,

इंसान की कोशिशें भी कमाल करती हैं,

यूं ही नहीं मिलती ऱब की मेहरबानी,

दऱ बदर इबादत करनी पड़ती है,

गर तू प्रयत्नों की झडी़ लगायेगा,

हारते-हारते भी तू जीत जायेगा,

यारों ये कोशिशें ही कुछ कमाल करती हैं,

साधारण इंसान को भी महान बना देती है,

दोस्त तू जोश, जज्बा अपना कायम रख़,

हौसलों की बरसात में भिगो के रख़,

ये तेरी कोशिशें एक दिन साकार होंगी,

देख लेना तुझे भी मंजिल मिल जायेगी,

ये कोशिशें ही हमें आशा प्रदान करती हैं,

छोटी-छोटी कोशिशें ही नये आयाम देती हैं,

कोशिशें ही हमें नयी-नयी राह दिखाती हैं,

कोशिशें ही हमें समस्या के हल दिलाती हैं,

सिर्फ हिम्मत और हौसला मत खोने देना,

कोशिशें दऱ बद़र तू करते रहना,

याद़ रख, यूं ही नहीं रचते इतिहास पन्नों में,

इंसान की मेहनत ही कुछ ऐसा रंग ले आती है,

कोशिशें ही कुछ ऐसा कमाल कर जाती हैं।

हारे हुए बन्दे को भी बाजी जीता जाती हैं।

  • सुनील माहेश्वरी, दिल्ली।

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